सेवा में,
माननीय अध्यक्ष महोदय,
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC)
मानवाधिकार भवन, कोटला रोड,
नई दिल्ली – 110002
विषय : छत्तीसगढ़ के पूर्व विधायक एवं अखिल भारतीय आदिवासी महासभा के अध्यक्ष श्री मनीष कुंजाम द्वारा बस्तर क्षेत्र में बंगाली समुदाय के विरुद्ध दिए गए भड़काऊ एवं घृणा–पूर्ण बयान पर संज्ञान लेने एवं तत्काल हस्तक्षेप किए जाने के संबंध में प्रार्थना–पत्र।
मान्यवर,
यह प्रार्थना–पत्र अखिल भारतीय बंग परिषद की ओर से विनम्रतापूर्वक प्रस्तुत है। अत्यंत वेदना एवं गंभीर चिंता के साथ निवेदन है कि छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर क्षेत्र में एक सार्वजनिक वीडियो–भाषण के माध्यम से बंगाली समुदाय के विरुद्ध जिस प्रकार की भाषा, आरोप तथा प्रत्यक्ष “सीधी चेतावनियाँ” दी जा रही हैं, वे न केवल समाज में वैमनस्य उत्पन्न करने वाली हैं, अपितु बंगाली मूल के भारतीय नागरिकों की सुरक्षा, गरिमा तथा उनके मौलिक अधिकारों को भी गंभीर रूप से संकटग्रस्त करने वाली प्रतीत होती हैं।
1. संबंधित व्यक्ति का परिचय
श्री मनीष कुंजाम एक भारतीय कम्युनिस्ट राजनेता हैं, जो छत्तीसगढ़ राज्य से हैं तथा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (Communist Party of India – CPI) के प्रमुख नेताओं में से एक माने जाते हैं। वे वर्ष 1993 से 1998 तक, तत्कालीन मध्यप्रदेश विधान सभा (जो वर्तमान में छत्तीसगढ़ राज्य का भाग है) की कॉन्टा विधानसभा क्षेत्र से निर्वाचित विधायक रह चुके हैं तथा वर्तमान में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य के रूप में सक्रिय हैं। साथ ही, वे अखिल भारतीय आदिवासी महासभा (All India Adivasi Mahasabha) के अध्यक्ष के रूप में भी कार्यरत हैं तथा बस्तर क्षेत्र के आदिवासी विषयों पर मुखर माने जाते हैं।
उपरोक्त पृष्ठभूमि के कारण उनके द्वारा दिया गया कोई भी सार्वजनिक वक्तव्य, विशेष रूप से बस्तर जैसे अत्यंत संवेदनशील एवं संघर्ष–पीड़ित क्षेत्र में, स्थानीय जन–जीवन, सामाजिक सद्भाव तथा प्रशासनिक दृष्टिकोण पर गहरा प्रभाव डालने की क्षमता रखता है।
2. आपत्तिजनक एवं चिंताजनक वक्तव्य की प्रकृति
उक्त वीडियो–भाषण में श्री मनीष कुंजाम द्वारा –
“बस्तर में घुसपैठ” तथा “बंगाली बसावट” जैसे शब्दों का प्रयोग करते हुए बंगाली समुदाय को संदिग्ध, अवांछित एवं बाहरी घुसपैठ करने वाले समूह के रूप में चित्रित किया गया।
बस्तर क्षेत्र में निवासरत बंगाली मूल के नागरिकों के संदर्भ में जिस प्रकार की भाषा, कथन–शैली एवं लहजा अपनाया गया, वह सामान्य श्रोताओं के मन में उनके प्रति ईर्ष्या, घृणा, अविश्वास एवं वैमनस्य की भावना उत्पन्न करने वाला प्रतीत होता है।
उक्त कथनों के माध्यम से प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से यह संकेत दिया गया कि बंगाली समुदाय की उपस्थिति/बसावट स्वीकार्य नहीं है तथा उनके विरुद्ध सामाजिक–राजनीतिक दबाव या कार्रवाई उचित है, जिससे यह भाषण आगे चलकर हिंसा या लक्षित उत्पीड़न को बढ़ावा देने वाले माध्यम के रूप में प्रयुक्त हो सकता है।
अखिल भारतीय बंग परिषद के दृष्टिकोण से, इस प्रकार के सार्वजनिक वक्तव्य वास्तव में “ईर्ष्या एवं शत्रुता का वातावरण” निर्मित करते हैं तथा बंगाली समुदाय को लक्ष्य बनाकर हिंसा, धमकी, सामाजिक बहिष्कार एवं प्रशासनिक दमन को उकसा सकते हैं।
3. संभावित संवैधानिक एवं मानवाधिकार उल्लंघन
ऐसे वक्तव्य अनेक संवैधानिक तथा स्वीकृत मानवाधिकार सिद्धांतों के प्रतिकूल हैं, जैसे कि –
अनुच्छेद 14 एवं 15 (समानता एवं भेदभाव–निषेध) – भाषा, जन्मस्थान या क्षेत्र के आधार पर किसी भी समुदाय को निशाना बनाना तथा उसके विरुद्ध शत्रुता फैलाना संवैधानिक समानता एवं न्याय–सिद्धांत के विपरीत है।
अनुच्छेद 19(1)(d) तथा 19(1)(e) – प्रत्येक भारतीय नागरिक को भारत के किसी भी भाग में आवागमन एवं निवास/बसावट का अधिकार प्रदत्त है; बस्तर क्षेत्र में विधिसम्मत रूप से निवास कर रहे बंगाली मूल के नागरिकों को “घुसपैठिया” या “अवैध बसावट” के रूप में प्रस्तुत करना इन अधिकारों के व्यवहारिक उपयोग को बाधित करने वाला वातावरण निर्मित करता है।
अनुच्छेद 21 (जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) – किसी समुदाय के विरुद्ध भय, असुरक्षा एवं अपमान का वातावरण उत्पन्न करना उनके गरिमामय एवं भय–मुक्त जीवन के अधिकार को गंभीर रूप से प्रभावित करने की आशंका उत्पन्न करता है।
भारत द्वारा मान्य मानवाधिकार मानकों के अनुसार भी किसी विशिष्ट भाषाई अथवा जातीय समुदाय के विरुद्ध घृणा–भाषण, धमकी अथवा हिंसा–उकसावे की प्रकृति के वक्तव्य स्पष्ट रूप से निंदनीय हैं तथा उनके विरुद्ध निवारक एवं दंडात्मक कार्रवाई अपेक्षित है।
अखिल भारतीय बंग परिषद का दृढ़ मत है कि इस प्रकार के वक्तव्य संविधान की मूल भावना, विशेषकर “भारत की अखंडता एवं एकता” तथा “समान नागरिकता” की अवधारणा के विरुद्ध हैं और बस्तर जैसे पहले से ही संवेदनशील क्षेत्र में सामाजिक विस्फोट एवं सामूहिक टकराव की स्थिति को और अधिक गंभीर बना सकते हैं।
4. आयोग से प्रार्थित कदम
अतः अखिल भारतीय बंग परिषद की ओर से, हम विनम्रतापूर्वक, परन्तु अत्यंत दृढ़ता के साथ, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से निम्नलिखित कदम उठाए जाने की प्रार्थना करते हैं –
बस्तर क्षेत्र में बंगाली समुदाय के विरुद्ध दिए गए उक्त वीडियो–भाषण का आधिकारिक संज्ञान लिया जाए तथा यह परीक्षण किया जाए कि क्या यह वक्तव्य घृणा–भाषण (hate speech), हिंसा के लिए उकसावा अथवा किसी विशिष्ट भाषाई समुदाय के मानवाधिकारों के व्यवस्थित उल्लंघन की ओर अग्रसर होने वाली प्रवृत्तियों का परिचायक है।
छत्तीसगढ़ राज्य सरकार, बस्तर जिला प्रशासन तथा संबंधित पुलिस अधिकारियों से विस्तृत प्रतिवेदन (रिपोर्ट) तलब किया जाए कि –
उक्त वक्तव्य/वीडियो के प्रसारण के पश्चात बंगाली समुदाय के विरुद्ध किसी प्रकार की धमकी, हमला, जबरन विस्थापन या सामाजिक–प्रशासनिक उत्पीड़न संबंधी शिकायतें प्राप्त हुई हैं या नहीं; यदि हुई हैं तो उन पर क्या कार्रवाई की गई है।
बस्तर क्षेत्र में निवासरत बंगाली समुदाय की सुरक्षा, रोजगार, आवास एवं आजीविका की वर्तमान स्थिति क्या है और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु स्थानीय प्रशासन द्वारा कौन–कौन से ठोस उपाय किए गए हैं।
आयोग द्वारा छत्तीसगढ़ राज्य सरकार को यह परामर्श/निर्देश दिया जाए कि –
भविष्य में किसी भी जन–प्रतिनिधि, संगठन अथवा व्यक्ति द्वारा किसी विशिष्ट भाषाई/जातीय समुदाय के विरुद्ध भड़काऊ, धमकीपूर्ण या घृणा–पूर्ण भाषा के प्रयोग को कड़ाई से रोका जाए तथा आवश्यकतानुसार विधि–सम्मत कार्यवाही सुनिश्चित की जाए।
बस्तर एवं अन्य क्षेत्रों में बंगाली समुदाय सहित सभी समुदायों के लिए समान सुरक्षा, निष्पक्ष एवं न्यायसंगत प्रशासन तथा बिना भेदभाव के कानूनी संरक्षण उपलब्ध कराया जाए।
यदि आयोग उपयुक्त समझे, तो बस्तर क्षेत्र में एक तथ्य–खोज/मानवाधिकार पर्यवेक्षण दल प्रेषित किया जाए, जो आदिवासी समुदायों के अधिकारों के साथ–साथ वहाँ निवासरत बंगाली एवं अन्य बाहरी समुदायों की स्थिति का स्वतंत्र एवं निष्पक्ष मूल्यांकन करे, ताकि किसी भी प्रकार के लक्षित उत्पीड़न अथवा संभावित हिंसा को समय रहते रोका जा सके।
5. निष्कर्ष एवं निवेदन
अखिल भारतीय बंग परिषद स्पष्ट रूप से यह अभिव्यक्त करना चाहती है कि आदिवासी समुदायों के वैध अधिकारों, उनकी भूमि, वन, जल तथा संसाधनों की सुरक्षा जितनी आवश्यक है, उतनी ही आवश्यक किसी भी अन्य भारतीय नागरिक के लिए समान नागरिकता, गरिमा–पूर्ण अस्तित्व एवं भय–मुक्त जीवन की संवैधानिक गारंटी भी है। परन्तु यदि किसी समुदाय के अधिकारों की रक्षा के नाम पर किसी अन्य भाषाई समुदाय के विरुद्ध भड़काऊ भाषा, धमकी अथवा हिंसा–उकसावा अपनाया जाता है, तो यह संविधान की मूल भावना एवं लोकतांत्रिक मर्यादा के प्रतिकूल है।
अतः हमारी सामूहिक प्रार्थना है कि माननीय आयोग इस प्रकरण में गंभीरता से संज्ञान लेकर, श्री मनीष कुंजाम जैसे प्रभावशाली सार्वजनिक व्यक्तियों द्वारा दिए गए ऐसे वक्तव्यों की समुचित जाँच कराए तथा आवश्यक परामर्श, निर्देश एवं अनुशंसा के माध्यम से यह सुनिश्चित करे कि बस्तर सहित समस्त भारतवर्ष में बंगाली समुदाय एवं अन्य सभी नागरिक बिना भय, बिना घृणा एवं बिना भेदभाव के, विधि द्वारा प्रदत्त अधिकारों के अनुरूप जीवन यापन कर सकें।
सादर,
अखिल भारतीय बंग परिषद की ओर से
श्री अरुण मुखर्जी
अध्यक्ष, अखिल भारतीय बंग परिषद
श्री किशोर तरफदार
महामंत्री, अखिल भारतीय बंग परिषद
श्री सुब्रत मंडल
महामंत्री, अखिल भारतीय बंग प
रिषद
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