सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक की लगातार जारी भूख हड़ताल के बीच एक बड़ा कानूनी और संवैधानिक सवाल सामने आया है। सवाल यह है कि यदि किसी व्यक्ति की हालत भूख हड़ताल के कारण गंभीर हो जाती है, तो क्या सरकार उसकी इच्छा के विरुद्ध उसे जबरन भोजन या चिकित्सकीय सहायता दे सकती है?
इस मुद्दे पर चर्चा इसलिए तेज हुई है क्योंकि दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल कर सोनम वांगचुक को चिकित्सकीय निगरानी में रखने और जरूरत पड़ने पर पोषण उपलब्ध कराने की मांग की गई है। अदालत ने फिलहाल सरकार और स्वास्थ्य अधिकारियों को उनकी सेहत पर लगातार नजर रखने और आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए हैं।
भारत में इससे पहले मणिपुर की मानवाधिकार कार्यकर्ता इरोम शर्मिला के मामले में भी ऐसा ही विवाद सामने आया था। इरोम शर्मिला ने सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून (AFSPA) के विरोध में वर्षों तक भूख हड़ताल की थी। उस दौरान प्रशासन ने उनकी जान बचाने के उद्देश्य से चिकित्सकीय प्रक्रिया के तहत उन्हें पोषण उपलब्ध कराया था।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण विरोध और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है, लेकिन इसके साथ ही राज्य पर नागरिकों के जीवन की रक्षा करने की भी जिम्मेदारी होती है। ऐसे मामलों में अदालतें आमतौर पर व्यक्ति के अधिकार और जीवन की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करती हैं।
दिल्ली हाईकोर्ट ने भी हालिया सुनवाई में कहा कि प्रत्येक नागरिक का जीवन मूल्यवान है और उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है। इसी कारण अदालत ने सोनम वांगचुक के नियमित स्वास्थ्य परीक्षण और आवश्यक चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं।
फिलहाल यह मामला केवल एक व्यक्ति की भूख हड़ताल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक अधिकारों और राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन से जुड़ी एक महत्वपूर्ण बहस बन चुका है। आने वाले दिनों में अदालत और प्रशासन के अगले कदम पर देशभर की नजरें टिकी रहेंगी।








