पाकिस्तान में आर्थिक संकट, बेरोजगारी, महंगाई और कमजोर होती शासन व्यवस्था के बीच अब वहां की सरकार को सबसे बड़ा खतरा देश के युवाओं से नजर आने लगा है। पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी ने एक आर्थिक सम्मेलन में युवाओं को लेकर ऐसी टिप्पणी की, जिसने देश की राजनीति और सोशल मीडिया दोनों में चर्चा छेड़ दी है।
नकवी ने कहा कि युवाओं को आप ‘यूथ’ कहें या ‘कॉकरोच’, अगर ये एकजुट हो गए तो पूरा सिस्टम उलट-पुलट सकता है। उनके इस बयान को महज एक विवादित टिप्पणी के तौर पर नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे पाकिस्तान की मौजूदा व्यवस्था के भीतर बढ़ते असंतोष की स्वीकारोक्ति के रूप में भी देखा जा रहा है।
आखिर ‘कॉकरोच’ शब्द क्यों आया?
मोहसिन नकवी ने युवाओं के लिए ‘कॉकरोच’ शब्द का इस्तेमाल उस संदर्भ में किया, जहां उनका इशारा संगठित युवा असंतोष और विरोध की ताकत की ओर था। उनका कहना था कि अगर ये युवा एकजुट हो गए तो ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है जिसे संभालना सरकार के लिए मुश्किल होगा।
दरअसल, नकवी की चिंता केवल सड़कों पर होने वाले किसी संभावित प्रदर्शन को लेकर नहीं दिखती। उनके बयान में रोजगार, मेरिट, न्याय और सरकारी व्यवस्था में बराबरी जैसे मुद्दे प्रमुख रूप से सामने आए।
उन्होंने माना कि पाकिस्तान अपने युवाओं को वह नहीं दे पा रहा है जिसकी उन्हें उम्मीद है। खास तौर पर नौकरी और योग्यता के आधार पर अवसर उपलब्ध कराने में व्यवस्था की नाकामी को उन्होंने गंभीर समस्या बताया।
यही वह बिंदु है जहां उनका बयान सामान्य राजनीतिक भाषण से आगे निकल जाता है।
‘लैपटॉप या थोड़े पैसे नहीं, रोजगार चाहिए’
पाकिस्तानी गृह मंत्री ने युवाओं की जरूरतों को केवल सरकारी योजनाओं या आर्थिक मदद तक सीमित नहीं माना। उन्होंने कहा कि युवाओं को लैपटॉप या कुछ पैसे देने भर से समस्या का समाधान नहीं होगा।
युवा चाहते हैं कि उन्हें मेरिट के आधार पर नौकरी मिले और आगे बढ़ने का वास्तविक अवसर मिले।
यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पाकिस्तान लंबे समय से आर्थिक दबाव, बेरोजगारी और सीमित रोजगार अवसरों की चुनौती से जूझ रहा है। ऐसे माहौल में युवा आबादी की नाराजगी किसी भी सरकार के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकती है।
नकवी ने इसी खतरे की तरफ इशारा करते हुए कहा कि सरकार को युवाओं की उम्मीदों को पूरा करने पर ध्यान देना चाहिए, इससे पहले कि उनका असंतोष बड़े विरोध में बदल जाए।
‘हमारा सिस्टम तबाह हो चुका है’
मोहसिन नकवी ने पाकिस्तान की शासन व्यवस्था पर भी खुलकर सवाल उठाए। उन्होंने स्वीकार किया कि देश की मौजूदा प्रणाली गंभीर रूप से कमजोर हो चुकी है और केवल सरकार में बैठे लोगों की मेहनत बढ़ाने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा।
उनके मुताबिक प्रधानमंत्री अगर घंटों काम करें, फिर भी जब तक सिस्टम में बुनियादी बदलाव नहीं किया जाता, तब तक सुधार मुश्किल रहेगा।
यह बयान पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था को लेकर सरकार के भीतर मौजूद चिंता को भी सामने लाता है।
नकवी ने प्रशासनिक ढांचे में बदलाव की जरूरत बताते हुए नए प्रशासनिक यूनिट और नए प्रांत बनाने की वकालत की। उनका तर्क था कि प्रशासन को लोगों के करीब लाने से न्याय और बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच बेहतर की जा सकती है।
भारत का उदाहरण देकर समझाया प्रशासनिक बदलाव
पाकिस्तानी गृह मंत्री ने अपने तर्क को समझाने के लिए भारत का उदाहरण भी दिया।
उन्होंने कहा कि आजादी के समय भारत में 14 प्रांत थे, जबकि समय के साथ प्रशासनिक जरूरतों के अनुसार इनकी संख्या बढ़ी। उनके मुताबिक बड़े प्रशासनिक ढांचे को छोटे और प्रभावी हिस्सों में बांटने से सरकार और जनता के बीच दूरी कम की जा सकती है।
नकवी का मानना है कि पाकिस्तान में भी प्रशासनिक इकाइयों पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है।
यह सुझाव ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान के अलग-अलग हिस्सों में लंबे समय से राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संसाधनों के बंटवारे और प्रशासनिक अधिकारों को लेकर बहस चलती रही है।
राजनीतिक दलों को भी दी नसीहत
मोहसिन नकवी ने केवल युवाओं और प्रशासनिक व्यवस्था की बात नहीं की। उन्होंने राजनीतिक दलों से भी मतभेद भुलाकर एक साथ बैठने और देश के भविष्य को लेकर सहमति बनाने की अपील की।
उनका कहना था कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अपनी जगह है, लेकिन देश की बुनियादी समस्याओं के समाधान के लिए राजनीतिक दलों को साझा रास्ता तलाशना होगा।
उन्होंने व्यापारिक समुदाय से भी राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने की अपील की। उनका कहना था कि कारोबारी वर्ग केवल चुनावी फंडिंग तक सीमित न रहे, बल्कि देश की राजनीतिक और आर्थिक दिशा तय करने में भी योगदान दे।
आर्थिक संकट के बीच बढ़ती युवा बेचैनी
पाकिस्तान की मौजूदा परिस्थितियों को देखें तो नकवी की टिप्पणी का महत्व और बढ़ जाता है।
देश पहले से ही महंगाई, कर्ज, बेरोजगारी, कमजोर अर्थव्यवस्था और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे समय में बड़ी युवा आबादी के बीच अगर यह धारणा मजबूत होती है कि शिक्षा के बाद भी रोजगार नहीं मिलेगा या योग्यता के बावजूद अवसर नहीं मिलेगा, तो असंतोष तेजी से राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।
यही कारण है कि नकवी का ‘कॉकरोच’ वाला बयान केवल एक अजीबोगरीब उपमा नहीं है। इसके पीछे सरकार की वह चिंता दिखाई देती है कि कहीं युवाओं की व्यक्तिगत नाराजगी सामूहिक आंदोलन का रूप न ले ले।
भारत के ‘कॉकरोच प्रोटेस्ट’ का भी संदर्भ
नकवी ने अपने बयान में भारत में हुए ‘कॉकरोच’ विरोध का संदर्भ भी दिया। इसी संदर्भ में उन्होंने पाकिस्तान में संभावित युवा एकजुटता को लेकर चेतावनी दी।
हालांकि उनके बयान का मूल संदेश यह था कि सरकार को विरोध की स्थिति पैदा होने का इंतजार करने के बजाय युवाओं की समस्याओं का समाधान पहले करना चाहिए।
असली चिंता ‘कॉकरोच’ नहीं, व्यवस्था है
मोहसिन नकवी के बयान को ध्यान से देखें तो इसकी सबसे अहम बात ‘कॉकरोच’ शब्द नहीं, बल्कि उसके पीछे की स्वीकारोक्ति है।
एक देश का गृह मंत्री सार्वजनिक मंच से यह कह रहा है कि युवाओं को रोजगार, मेरिट और न्याय नहीं मिल पा रहा और अगर यही युवा एकजुट हो गए तो व्यवस्था को बदलने की ताकत रखते हैं।
यानी बहस इस बात से आगे बढ़ जाती है कि उन्होंने युवाओं के लिए कौन-सा शब्द इस्तेमाल किया। असली सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान अपनी युवा आबादी की उम्मीदों को पूरा करने में सफल हो पाएगा?
क्योंकि किसी भी देश में युवा आबादी केवल जनसंख्या का हिस्सा नहीं होती। अगर उसे अवसर मिलता है तो वही आर्थिक विकास की सबसे बड़ी ताकत बनती है। लेकिन जब अवसर कम होते हैं और व्यवस्था पर भरोसा कमजोर पड़ता है, तो यही वर्ग बदलाव की सबसे बड़ी मांग भी खड़ी कर सकता है।
पाकिस्तान में इस समय शायद यही डर सत्ता के गलियारों में सबसे ज्यादा दिखाई दे रहा है।








