स्थानीय मुद्रा को बढ़ावा: भारत-श्रीलंका ‘रुपया-से-रुपया’ कॉरिडोर पर मंथन

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कोलंबो। वैश्विक स्तर पर अमेरिकी डॉलर जैसी विदेशी मुद्राओं पर निर्भरता कम करने के प्रयासों के बीच भारत और श्रीलंका ने अपने व्यापारिक रिश्तों को एक नया ढांचा देना शुरू कर दिया है। श्रीलंका में स्थित भारतीय उच्चायोग द्वारा कोलंबो में एक उच्च स्तरीय राउंडटेबल बैठक का आयोजन किया गया। इस बैठक का मुख्य विषय “रुपया-से-रुपया: भारत-श्रीलंका कमर्शियल कॉरिडोर को मज़बूत करना” रखा गया था। इसका प्राथमिक उद्देश्य दोनों पड़ोसी देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार में स्थानीय मुद्राओं (भारतीय रुपया-श्रीलंकाई रुपया) के उपयोग को बढ़ावा देना है।

भारतीय उच्चायोग ने जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में बताया कि इस कार्यक्रम में दोनों देशों के सरकारी संस्थानों, बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र के संगठनों, उद्योग जगत के नेताओं, आयातकों, निर्यातकों और व्यापार से जुड़े लोगों के वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इसका मकसद स्थानीय मुद्राओं के ज़्यादा इस्तेमाल के ज़रिए भारत और श्रीलंका के बीच आर्थिक और व्यापारिक संबंधों को और गहरा करने के मौकों पर चर्चा करना था।

उच्चायोग ने कहा राउंडटेबल की शुरुआत श्रीलंका में भारत के उच्चायुक्त संतोष झा के स्वागत भाषण से हुई। उन्होंने भारत और श्रीलंका के बीच बढ़ती आर्थिक साझेदारी पर प्रकाश डाला और द्विपक्षीय व्यापार, निवेश और वित्तीय कनेक्टिविटी को आसान बनाने में स्थानीय मुद्रा में भुगतान की व्यवस्था (सेटलमेंट मैकेनिज्म) के महत्व पर ज़ोर दिया। मुख्य भाषण श्रीलंका के केंद्रीय बैंक (सीबीएसएल) के गवर्नर डॉ. पी. नंदलाल वीरसिंघे ने दिया। उन्होंने भारतीय रुपया-श्रीलंकाई रुपया (आईएनआर-एलकेआर) लेन-देन को सहारा देने वाले वित्तीय ढांचे को मज़बूत करने के लिए हाल ही में उठाए गए नीतिगत कदमों की रूपरेखा बताई और दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश के संबंधों को मज़बूत करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया।

भारतीय उच्चायुक्त झा ने बैठक में कहा कि स्थानीय मुद्रा में निपटान करने से न केवल लेन-देन की लागत घटती है, बल्कि विनिमय दर में होने वाले उतार-चढ़ाव का जोखिम भी खत्म होता है।

दुनिया भर में विभिन्न देश अब अपनी घरेलू मुद्राओं में सीमा पार लेनदेन को प्राथमिकता दे रहे हैं। इस राउंडटेबल में भारत की ओर से पेश रणनीति इसी वैश्विक बदलाव का हिस्सा मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि ‘रुपया-से-रुपया’ का यह कमर्शियल कॉरिडोर दोनों देशों के छोटे और मध्यम उद्योगों (एसएमई) के लिए व्यापार को बेहद सुगम बना देगा। भारत अब विदेशी मुद्राओं पर अपनी निर्भरता घटाते हुए अपने रुपये का अंतर्राष्ट्रीयकरण करने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है और श्रीलंका के साथ यह साझेदारी इस मुहिम का एक बेहद मजबूत और विश्वसनीय स्तंभ बनकर उभरी है।

(रिपोर्ट. शाश्वत तिवारी)

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