बिहार की हाई-प्रोफाइल बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में मतदान उम्मीद से काफी कम रहा। निर्वाचन आयोग के अनुसार कुल 34.30 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया, जिसने चुनावी मुकाबले से ज्यादा वोटिंग प्रतिशत पर चर्चा छेड़ दी है। कम मतदान ने अब राजनीतिक दलों की रणनीति और उनके समर्थक वोट बैंक की सक्रियता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कम मतदान क्यों बना चर्चा का विषय?
बांकीपुर पटना शहर का प्रमुख शहरी विधानसभा क्षेत्र है। ऐसे क्षेत्रों में आमतौर पर मतदान प्रतिशत ग्रामीण इलाकों की तुलना में कम रहता है, लेकिन इस बार का आंकड़ा राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान खींच रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान तीन प्रमुख ताकतें मैदान में थीं—बीजेपी, राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और प्रशांत किशोर की जन सुराज। ऐसे में माना जा रहा था कि मुकाबला वोटरों को बूथ तक खींच लाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
बीजेपी के लिए क्या मायने?
बांकीपुर लंबे समय से बीजेपी का मजबूत गढ़ माना जाता है। पार्टी की उम्मीद इस बात पर टिकी होगी कि उसका परंपरागत और अनुशासित वोटर कम मतदान के बावजूद घर से निकला होगा। यदि बीजेपी का कोर वोट बैंक पूरी तरह सक्रिय रहा, तो कम मतदान उसके लिए नुकसान की बजाय लाभदायक साबित हो सकता है।
हालांकि यदि शहरी समर्थकों में उदासीनता रही और वोट प्रतिशत उसी वजह से गिरा, तो मुकाबला अपेक्षा से ज्यादा कठिन भी हो सकता है।
आरजेडी की चुनौती
आरजेडी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने समर्थकों को मतदान केंद्र तक लाने की थी। कम वोटिंग यह संकेत भी दे सकती है कि विपक्षी मतदाता अपेक्षित संख्या में बाहर नहीं निकले। यदि ऐसा हुआ है, तो पार्टी के लिए जीत की राह मुश्किल हो सकती है।
दूसरी ओर, अगर कम मतदान का कारण बीजेपी समर्थकों की निष्क्रियता रही हो और आरजेडी का वोट बैंक संगठित तरीके से मतदान करने पहुंचा हो, तो परिणाम चौंकाने वाले भी हो सकते हैं।
प्रशांत किशोर की जन सुराज के लिए पहली बड़ी परीक्षा
बांकीपुर उपचुनाव को जन सुराज के लिए प्रतिष्ठा का चुनाव माना जा रहा है। प्रशांत किशोर ने इस सीट पर पूरी ताकत लगाई और संगठन के कार्यकर्ताओं ने बूथ स्तर तक सक्रिय अभियान चलाया। कई स्थानीय रिपोर्टों में जन सुराज के कार्यकर्ताओं की सक्रियता का भी उल्लेख किया गया।
अब सवाल यह है कि क्या यह सक्रियता वोटों में बदल पाई या नहीं। यदि जन सुराज नए और युवा मतदाताओं को मतदान केंद्र तक नहीं ला सकी, तो कम मतदान उसके लिए चिंता का विषय बन सकता है।
क्या कम वोटिंग किसी एक दल को फायदा देती है?
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि कम मतदान का सीधा फायदा या नुकसान तय नहीं होता। इसका असर इस बात पर निर्भर करता है कि किस दल का कोर वोट बैंक अधिक संख्या में मतदान करने निकला।
- यदि बीजेपी का पारंपरिक वोटर सक्रिय रहा, तो पार्टी को बढ़त मिल सकती है।
- यदि विपक्षी मतदाता अपेक्षा से अधिक निकले, तो मुकाबला कड़ा हो सकता है।
- यदि जन सुराज ने नए वोटरों को जोड़ने में सफलता हासिल की, तो चुनावी गणित बदल सकता है।
यानी 34.30 प्रतिशत का मतदान अपने आप में किसी दल की जीत या हार तय नहीं करता, लेकिन यह जरूर बताता है कि इस चुनाव में हर वोट की अहमियत पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है।
अब सबकी नजर नतीजों पर
मतदान समाप्त होने के बाद सभी उम्मीदवारों की किस्मत ईवीएम में बंद हो चुकी है। अब निगाहें मतगणना पर हैं, जहां यह साफ होगा कि कम मतदान ने किस दल की रणनीति को सफल बनाया और किसके लिए यह चेतावनी साबित हुआ।








