दस्तक टुडे,लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के पॉश इलाके अलीगंज (पुरनिया) में सोमवार (22 जून 2026) को हुए भीषण अग्निकांड ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है। ऊषा मेहता मार्ग स्थित एक तीन मंजिला इमारत में लगी इस भयावह आग में 15 मासूम छात्रों और युवाओं की दर्दनाक मौत हो चुकी है。 इस जघन्य हादसे के बाद ‘दस्तक टुडे’ की विशेष खोजी टीम सूत्रों के हवाले से जानकारी एकत्रित की तो जो जानकारी सामने आई वो इस तरह की है कि एलडीए (लखनऊ विकास प्राधिकरण ने हमेशा की तरह आंखें बंद के काम किया जिसका नतीजा एक दर्दनाक हादसे के रूप में हमारे सामने आया
हमारी इस विशेष रिपोर्ट में जानिए इस मौत की इमारत का पूरा इतिहास, इसका नक्शा, प्लॉट नंबर और वे जिम्मेदार अधिकारी जिनके संरक्षण में यह अवैध खेल चलता रहा ।
किस प्लॉट पर हुआ था इस बिल्डिंग का निर्माण?
सरकारी रिकॉर्ड और लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) से मिले कानूनी दस्तावेजों के मुताबिक, यह खूनी खेल साल 1980 से शुरू हुआ था:
प्लॉट और भवन संख्या: यह बिल्डिंग अलीगंज योजना के सेक्टर-डी स्थित भवन संख्या एमएस/102/डी (MS/102/D) पर निर्मित है。
क्षेत्रफल: इस पूरे भवन का कुल क्षेत्रफल 1992 वर्ग फुट है。
स्वामित्व का इतिहास: यह प्लॉट सबसे पहले 11 जुलाई 1980 को लॉटरी के जरिए विजय कुमार (पुत्र रामेश्वर सहाय) को आवंटित हुआ था। इसके बाद साल 2005 और फिर 2013 में इसे वीरेंद्र प्रताप शुक्ला और सुरेंद्र प्रताप शुक्ला को बेच दिया गया। एलडीए ने 7 अगस्त 2014 को नए स्वामियों के नाम इसका नामांतरण (म्यूटेशन) किया था
कैसा था नक्शा और किसने पास किया
इस हादसे के बाद सबसे बड़ा खुलासा यह हुआ है कि यह बिल्डिंग कागज पर कुछ और थी और जमीन पर मौत का कमर्शियल कॉम्प्लेक्स बन चुकी थी।
नक्शा पास करने वाली संस्था: इस बिल्डिंग का नक्शा लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) द्वारा पास किया गया था।
आवासीय मानचित्र की मंजूरी: रिकॉर्ड के अनुसार, एलडीए के संबंधित तत्कालीन अधिकारियों और आर्किटेक्ट/मानचित्रकारों द्वारा 20 अगस्त 2014 को केवल ‘आवासीय’ (Residential) उपयोग के लिए मानचित्र स्वीकृत किया गया था।
नक्शे का उल्लंघन: कागज पर यह सिर्फ रहने का मकान था, लेकिन नियमों को ताक पर रखकर इस पर तीन मंजिला कमर्शियल कॉम्प्लेक्स खड़ा कर दिया गया। ग्राउंड फ्लोर पर पेट शॉप और ऊपरी मंजिल पर अवैध रूप से एनिमेशन कोचिंग सेंटर और गेमिंग ज़ोन का संचालन हो रहा था, जिसके पास कोई फायर एनओसी (Fire NOC) भी नहीं थी।
साल 2016 का वो ‘काला खेल’: कौन-कौन से अधिकारी थे जिम्मेदार?
‘दस्तक टुडे’ की पड़ताल में सबसे चौंकाने वाला मोड़ यह आया है कि इस बिल्डिंग को वर्ष 2016 में ही अवैध निर्माण के चलते ढहाने (ध्वस्तीकरण) का आदेश जारी हुआ था। तत्कालीन एलडीए प्रशासन ने वीरेंद्र प्रताप शुक्ला के खिलाफ अवैध कमर्शियल निर्माण का मुकदमा दर्ज कर 10 मई 2016 को ध्वस्तीकरण का अंतिम आदेश पारित किया था।
लेकिन महज दो महीने के भीतर, 5 जुलाई 2016 को एलडीए के भ्रष्ट अफसरों ने इस आदेश को निरस्त (revoked) कर दिया और फाइलें दबा दीं। अगर 10 साल पहले वो ध्वस्तीकरण आदेश लागू हो जाता, तो आज ये 15 मासूम जिंदा होते。
उस समय (वर्ष 2016) के मुख्य जिम्मेदार अधिकारी और विभाग जो अब जांच के घेरे में हैं:
1. एलडीए के तत्कालीन जोन-5 के जोनल अधिकारी और विहित प्राधिकारी: जिन्होंने मई 2016 में ध्वस्तीकरण आदेश जारी किया, लेकिन जुलाई 2016 में संदिग्ध परिस्थितियों में उसे निरस्त कर दिया।
2. क्षेत्रीय जूनियर इंजीनियर (JE) और असिस्टेंट इंजीनियर (AE): जिनकी जिम्मेदारी अवैध कमर्शियल गतिविधियों को रोकने और सीलिंग की कार्रवाई करने की थी, लेकिन उन्होंने आंखें मूंद लीं।
3. तत्कालीन मुख्य नगर नियोजक (Chief Town Planner) और मानचित्र सेल के अधिकारी: जिन्होंने आवासीय भूखंड पर धड़ल्ले से चल रही कमर्शियल बिल्डिंग की मैपिंग और डेविएशन की अनदेखी की।
4. तत्कालीन जिला अग्निशमन अधिकारी (DFO) व फायर सेफ्टी टीम: जिन्होंने बिना किसी इमरजेंसी एग्जिट और बिना फायर सेफ्टी उपकरणों वाली इस बहुमंजिला इमारत को वर्षों तक बिना एनओसी के चलने दिया।

अब तक क्या हुआ एक्शन
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सख्त रुख के बाद एक आईएएस और एक आईपीएस अधिकारी की दो सदस्यीय उच्च स्तरीय SIT जांच कमेटी गठित की गई है, जिसे 7 दिन में रिपोर्ट सौंपनी है。 वर्तमान में पुलिस ने मुख्य आरोपी और बिल्डिंग मालिक समेत तीन लोगों को गिरफ्तार कर लिया है。 लेकिन जनता का सवाल साफ है—बिल्डिंग मालिकों के साथ-साथ साल 2016 में ध्वस्तीकरण आदेश को रद्दी की टोकरी में डालने वाले एलडीए के उन तत्कालीन भ्रष्ट अधिकारियों पर बुलडोजर कब चलेगा।
ब्यूरो रिपोर्ट, दस्तक टुडे, लखनऊ।





