पटना की बांकीपुर सीट पर सोमवार को बिहार की राजनीति ने एक ऐसा मोड़ लिया, जिसकी उम्मीद खुद बीजेपी के रणनीतिकारों को भी नहीं थी। जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने अपने राजनीतिक करियर के पहले ही चुनाव में बीजेपी के तीन दशक पुराने गढ़ को ध्वस्त कर दिया।
खास बात यह है कि यह सीट कोई मामूली सीट नहीं थी। यहां से बीजेपी के मौजूदा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन लगातार पांच बार जीत चुके थे, और उनसे पहले उनके पिता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा भी यह सीट जीत चुके थे। 1995 से लेकर 2025 तक, यहां तक कि लालू-राबड़ी शासन के चरम दौर में भी, इस सीट पर कमल का परचम लहराता रहा था।
कैसे बदली बाजी
नितिन नवीन के बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने और राज्यसभा जाने के बाद यह सीट खाली हुई थी। बीजेपी ने पहले नितिन नवीन के करीबी अभिषेक कुमार ‘बंटी’ को टिकट दिया, लेकिन नामांकन के अगले ही दिन ‘पारिवारिक कारणों’ का हवाला देकर उनकी जगह नीरज कुमार सिन्हा को उतारा गया। इस अचानक बदलाव ने पार्टी की भीतरी गुटबाजी और ओवरकॉन्फिडेंस को उजागर कर दिया।
दूसरी ओर, प्रशांत किशोर ने चुनाव प्रचार के दौरान सीधे मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को निशाने पर रखा। उन्होंने मतदाताओं से कहा था कि बांकीपुर से एक वोट सिर्फ विधायक नहीं, मुख्यमंत्री बदलने की दिशा तय करेगा। इसी बीच नीट पेपर लीक और भरत तिवारी एनकाउंटर जैसे मुद्दों ने बीजेपी की मुश्किलें और बढ़ा दीं।
नतीजों का गणित
चुनाव आयोग के मुताबिक प्रशांत किशोर ने करीब 19,324 वोटों से जीत दर्ज की, जबकि आरजेडी प्रत्याशी की जमानत तक जब्त हो गई। आंकड़े बताते हैं कि जिस सीट पर बीजेपी को 2005 के बाद कभी 59 फीसदी से कम वोट नहीं मिला और नौ महीने पहले ही नितिन नवीन को 63 फीसदी वोट मिले थे, वहां इस बार बीजेपी प्रत्याशी सिर्फ 34.50 फीसदी वोट पर सिमट गए। प्रशांत किशोर को 49.23 फीसदी वोट मिले।
यह गिरावट साफ इशारा करती है कि बीजेपी का पारंपरिक शहरी कायस्थ-बनिया वोट बैंक भी इस बार पार्टी से खिसक गया।
जीत के बाद पीके का बयान
जीत के बाद प्रशांत किशोर ने संयमित प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि उनके जीतने भर से “बांकीपुर बैंगलोर नहीं बन जाएगा”, लेकिन सुधार की दिशा में काम जरूर होगा। उन्होंने बीजेपी नेतृत्व से किसी “अच्छे चरित्र वाले व्यक्ति” को मुख्यमंत्री बनाने की मांग दोहराई।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बांकीपुर के नतीजे सिर्फ एक उपचुनाव तक सीमित नहीं हैं — यह संकेत है कि बिहार की राजनीति में अब एक नया समीकरण आकार ले रहा है, जो आने वाले वक्त में सत्ता के पुराने ध्रुवों को चुनौती दे सकता है।








